एक हसीन रात

              






       एक हसीन रात

वो एक हसीन रात थी।
जब तु मेरे साथ थी।

कहती थी, “अब जुदा न होंगें हम"। 
यही से शायद , बेवफाई कि शुरुआत थी।

में समझ न पाया उसे,
क्या पता, यहीं मेरी बेवकुफी थी?

में प्यार करता रहा उसे,
लेकिन उनको मेरी कदर न थी।

सोचा एक दिन समझ जाएगी।
मेरे प्यार से वो , भी पिघल जाएगी।

जितना करता हूं , में प्यार उसे
उतना ही , वो भी एक दिन प्यार मुझसे कर जाएगी।

लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं
मेरी वफाई का बदला क्यों वफाई नहीं?

अब तो रात हर दिन होती है
लेकिन वो रात हसीन नहीं होती है।

----- ममता चौहान

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