सुबह, Morning




                         सुबह

एक चेहकती हुई सुबह
मुझे तडके - तडके उठाती है।
मेरी निंद नहीं खुलती
लेकिन फिर भी मुझे जगाती है।

कहती हैं आ के
काश में मेरी
‘उठ जा ममता ,
हो गई सुबह तेरी'

में चादर को सिरहाने दबाकर
मानों कहती हुं उससे
‘ नहीं थोड़ा सा तो रहमकर
सोने दे बस्स जरासा और मुझे'

फिर भी वो मानती कहां!
चिड़ियों की खिलखिलाहट ले
आज जाती है मेरे सामने
लेकिन मैं भी उठती कहां?

देख के अनदेखी करती हुं।
चादर से मुंह ढक लेती हुं।
फिर सुरज को भी देखा नहीं जाता
आखिरकार मुझे जगा ही दिया जाता।

              --------------- ममता चौहान

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