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जो बीत गई सो बात गई- हरिवंशराय बच्चन

  जो बीत गई सो बात गई                           -------  हरिवंशराय बच्चन जीवन में एक सितारा था माना वह बेहद प्यारा था वह डुब गया तो डुब गया अम्बर के आनन को देखो कितने इसके तारे कुटे कितने इसके प्यारे छूटे जो छुट गए फिर कहां मिले पर बोलो टुटे तारों पर  कब अम्बर शोक मनाता है जो बीत गई सो बात गई जीवन में वह था एक कुसुम थे उसपर नित्य निछावर तुम वह सुख गया तो सुख गया मधुवन की छाती को देखो सुखी कितनी इसकी कलियां मुर्झाई कितनी वल्लरियां जो मुर्झाई फिर कहां खिली पर बोलो सुखे फुलों पर कब मधुवन शोर मचाता है जो बीत गई सो बात गई जीवन में मधु का प्याला था तुमने तन मन दे डाला था वह टुट गया तो टुट गया मदिरालय का आंगन देखो कितने प्याले हिल जाते हैं गिर मिट्टी में मिल जाते हैं जो गिरते हैं कब उठते हैं पर बोलो टुटे प्यालों पर कब मदिरालय पछताता है जो बीत गई सो बात गई मृदू मिट्टी के है बने हुए मधु घट फुटा ही करते हैं लघु जीवन लेकर आए हैं प्याले टुटा ही करतें हैं फिर भी मदिरालय के अन्दर मधु के घट है, मधु प्याले है जो मादकता...

हकीकत बातें....

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हकीकत बातें.... जब आए हैं हम अपना किरदार निभाने तो क्यों ना हम कुछ इस तरहां से निभायें कि, जीते जी हमें जान सके लोग और मरने के बाद भी ना बिसरायें। जिंदगी को करिब से देखो शक कि निगाहों  से , तो मत ही देखों जिंदगी तो है, बेहते पानी की तरहां कुडे को किनारा देकर जिंदगी को साफ पानी कि तरहां  बेहने दो। ये ऑंखें बहुत फरेबी है गम में भी रुलाती है और खुशी में भी रुलाती है बस्स फर्क इतना है कि, हम खुशी में सब के सामने रो सकते है पर दुःख में नहीं। -------------- ममता चौहान

जिंदगी जीने का मुलमंत्र

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जिंदगी जीने का मुलमंत्र में जिंदगी से डरती हुं कुछ भी नया करने से कतराती हुं। सोचती हुं की जो पुराना है , वहीं सही है। फिर क्यों बदलाव चाहती हुं? जिना- मरना तो आम बात है इसमें खुल के जिना , हमारे हाथ है तनाव तो जिंदगी में सब को है लेकिन ये भी तो अनिश्चित है। किसी को दुःख देकर तुम खुद कभी खुश नहीं रह सकते। लेकिन अगर दुसरों कि खुशियों में  अगर अपनी खुशी दिख जाये तो, तुम खुशनसीब हो अगर कोई तुम्हें दुःख भी पहुंचाना चाहे फिर भी तुम दुसरों कि खुशियों में शरिख होकर हमेशा खुश ही रहोगे।  ----------------- ममता चौहान

गुमनाम आशिक , कविता

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                 गुमनाम आशिक जिंदगी है सुनी सी, इसमें किसीको आने मत देना। जो कोई आ गया तो फिर उसे जाने मत देना। वरना हमेशा यादें आती ही रहेंगी।धुंधली सी! यादों से क्या होता है? वो ना रहे तो फिर बातों से क्या होता है। हमें आप की याद आती है..... फिर ये बात कहने से क्या होता है? जब में साथ थी तुम्हारे तब मुड़कर भी देखा न तुमने आज जो तुमसे दुर हो गयी तो अब रोने से क्या होता है? मेरे ख्यालों में डुबे तुम रहते हो। न जाने क्या? अपने आप से ही बड़बड़ाते हो? घमंड था जीस बात पर कल तुम्हें आज उसी से जिंदगी बिताते हों! जो जगहा कभी खाली न थी। आज विरान हो गई है। जहां किसी का बसेरा था। आज सुन- सान हो गई है। सोचा जिंदगी बहुत बड़ी है। किसी के चले जाने से क्या फर्क पड़ता है? लेकिन जब जिंदगी में आगे बढ़ने की कोशिश की, तो ऐसा लगा,कि मानों वो ही तो मेरी जिंदगी थी।                ----------  ममता चौहान                 

एक अजनबी

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                *  एक अजनबी * वो एक अजनबी आज एक अजनबी है। कल शायद नहीं रहेगा। वो मेरा अपना बन जाएगा। आज में कतराती हूं उससे बात करने में, नजरें मिलाने में वो शायद कल मेरा हमसफ़र बन जाएगा। मेरी अनकही बातें, इशारों से ही समझ जाएगा। मेरे सुख और दुःख में, हमेशा मेरा साथ निभाएगा। मेरी हंसी के पिछे, मेरे ग़म को समझ जाएगा। मेरी डांट के पिछे, मेरा प्यार उसे दिख जाएगा। शायद वो अजनबी मेरी जिंदगी में भी आएगा। वो अजनबी नहीं बल्कि वो मेरा अपना बन जाएगा। ---------- ममता चौहान

जिंदगी का पेहलू

            जिंदगी का पेहलू चलने का नाम जिंदगी है। जीवन नदी के समान बहता रहता है। हां, लेकिन समुद्र में जाकर मिल जरूर जाता है। वैसे ही, ये सुहानी सी जिंदगी हमेशा नहीं रहती है। कभी उतार-चढ़ाव आ जाते हैं। इन पड़ावों को धैर्य से पार करते चलो। मेरी और आप की जिंदगी अलग है। लेकिन साथ एक-दूसरे का हमेशा देते चलों। माना मुश्किल बहुत है। लेकिन होंसला हमेशा बड़ा रखो अगर बड़े सपने देखे हैं। तो उन्हें पुरा करने का साहस भी तो रखों! कामयाबी मिले ना मिले प्रयत्न तुम सदा करो अपने लिए ना सही लेकिन सब के लिए तुम दुआ करों। किसी की दुआ रंग लायेगी जब हम मुकाम तक पहुंचोगे तब भी तुम, किसी का साथ मत छोड़ना क्योंकि इंसानियत ही इंसान को काम आएगी। -------- ममता चौहान

सुबह, Morning

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                          सुबह ए क चेहकती हुई सुबह मुझे तडके - तडके उठाती है। मेरी निंद नहीं खुलती लेकिन फिर भी मुझे जगाती है। कहती हैं आ के काश में मेरी ‘उठ जा ममता , हो गई सुबह तेरी' में चादर को सिरहाने दबाकर मानों कहती हुं उससे ‘ नहीं थोड़ा सा तो रहमकर सोने दे बस्स जरासा और मुझे' फिर भी वो मानती कहां! चिड़ियों की खिलखिलाहट ले आज जाती है मेरे सामने लेकिन मैं भी उठती कहां? देख के अनदेखी करती हुं। चादर से मुंह ढक लेती हुं। फिर सुरज को भी देखा नहीं जाता आखिरकार मुझे जगा ही दिया जाता।               --------------- ममता चौहान